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प्रस्तावना- हमारे देश में समय समय पर अनेक पर्व त्योहार मनाए जाते हैं। इन पर्वों का हमारे जीवन में विशेष महत्व है। इनसे हमारे जीवन में उत्साह के साथ साथ आनंद प्राप्त होता है। इन पर्वों से परस्पर प्रेम और भाईचारे की भावना पैदा होती है और परस्पर सहानुभूति बढ़ती है। इन पर्वों और त्योहारों से हम सच्चाई, नैतिकता और आदर्श की शिक्षा ग्रहण करते हैं। ये पर्व हमारे अतीत के गौरव और उसके महत्व का संदेश देते हैं। ऐसे त्योहारों में दुर्गा पूजा भी बहुत ही महत्वपूण्र्र पर्व है

कब और क्यों मनाया जाता है- उत्तर भारत में आष्विन मास के शुक्ल पक्ष की दशमी को विजय दशमी अथवा ‘दशहरे’ का पर्व उत्साह और उल्लासपूर्वक मनाया जाता है। बंगाल में यही पर्व दुर्गा पूजा के रूप में मनाया जाता है।

एक पौराणिक कथा प्रसिद्ध है। इस कथा के अनुसार महिशासुर नामक राक्षस ने आतंक मचा रखा था। उसके अत्याचार से संसार में त्राहि त्राहि मची हुई थी। देवता भी उससे बहुत दुखी थे। भगवान शंकर को इससे बहुत क्रोध आया। उनकी क्रोधाग्र ने एक दैवी शक्ति का रूप धारण कर लिया। उसी दैवी शक्ति ने रणचंडी का रूप धारण किया। रणचंडी अथवा दुर्गा माता ने महिशासुर को चुनौती दी। महिशासुर राक्षस और दुर्गा माँ के बीच नौ दिन तक घनघोर संग्राम चलता रहा। अन्त में दसवें दिन महिशासुर मारा गया। दुर्गा माँ विजयी रहीं। दुर्गा माता को अपने श्रद्धा सुमन चढ़ाने के लिए यह पर्व तब से बड़ी धूम धाम के साथ अब न केवल बंगाल में बल्कि भारत के कौने कौने में मनाया जाने लगा है।

कैसे मनाया जाता है- प्रायः प्रत्येक घर में दुर्गा की मूर्ति की स्थापना की जाती है। आश्विन शुक्ल प्रतिपदा से लेकर नौ दिन तक बड़ी श्रद्धापूर्वक इसकी भक्ति, पूजा और उपासना करते हैं। दुर्गा माता की मूर्ति सजा कर बड़ी श्रद्धा और भक्ति के साथ उसकी झाँकियाँ भी निकाली जाती हैं। सार्वजनिक स्थानों पर भी दुर्गा माता की मूर्ति की स्थापना की जाती है। नौ दिन तक श्रद्धापूर्वक भक्ति और पूजा उपासना के बाद दसवें दिन दुर्गा की मूर्ति को किसी पवित्र नहीं, तालाब यी झील में विसर्जित कर देते हैं।

संदेश- इस पर्व से हमें यह प्रेरणा मिलती है कि पाप का सदा नाश होता है। धर्म की विजय होती है। इसलिए हमें सदा अच्छे कार्य करने चाहिए और अपने जीवन को सन्मार्ग पर ले जाना चाहिए।

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